Monday, June 29, 2020

गांधी फौज- ए- आम कॉलेज में हिंदी विभाग द्वारा आमिर खुसरो का साहित्यिक - सांस्कृतिक कार्यक्रम



गांधी फ़ैज़-ए-आम काॅलेज में हिंदी विभाग द्वारा ‘अमीर ख़ुसरो का साहित्यिक-सांस्कृतिक अवदाऩ’ विषय पर दो दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय वेब संगोष्ठी के दूसरे दिन देश-विदेश के विभिन्न वक्ताओं ने अपने विचार व्यक्त किए। कार्यक्रम का आरंभ अपूर्व मिश्रा और रुचि सक्सेना के द्वारा अमीर खुसरो की कव्वाली ‘छाप तिलक सब छीनी’ से हुआ।
कार्यक्रम अध्यक्ष प्राचार्य प्रोफेसर जमील अहमद ने अतिथियों का स्वागत किया। उन्होंने कहा कि अमीर खुसरो हमारे दौर के सबसे प्रासंगिक कवि हैं। उन पर व्यापक विमर्श हमारे समय की ज़रूरत है।
हिंदी विभाग, महात्मा गांधी इंस्टीट्यूट माॅरीशस के डाॅ0 वेदरमण पांडे ने कहा कि खुसरो हिंदुस्तानी तहज़ीब के असली पैरोकार थे। वे पितृ पक्ष से तुर्की किंतु मातृ पक्ष से हिंदुस्तानी थे। हिंदवी को वे अपनी मातृभाषा मानते थे। वे कहते थे कि हिंदवी को जल की रवानी के साथ बोल सकता हूं। हिंदी के संबंध में विचार करने पर तीन मत सामने आते हैं। एक तो अमीर ख़ुसरो  हिंदवी को फारसी से कम नहीं मानते थे, दूसरे वे हिंदवी के काव्यशास्त्र और भाषा को अरबी से कमतर नहीं समझते थे, तीसरे उनकी हिंदवी में बूंद को सागर समाहित करने की शक्ति थी। उन्होंने आगे कहा कि खुसरो राजनीति की उठापटक से दूर रहे। दरबार में रहते हुए भी उन्होंने दरबारदारी नहीं की। वे ऐसे विलक्षण व्यक्तित्व थे जिन्हें राजा, संत, जनता, सभी प्रेम करते थे।
ओस्लो, नार्वे से जुड़े स्पाइल दर्पण के संपादक सुरेश चंद्र शुक्ला ‘शरद आलोक’ ने स्वयं की रची हुई कविताएं सुनाईं और नार्वे की संस्कृति से रूबरू कराया। उन्होंने कहा कि अमीर खुसरो के काव्य में भारतीय संस्कृति को जिन प्रशंसापूर्ण शब्दों में स्मरण किया गया है, वह अन्यत्र दुर्लभ है।
अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय, हिंदी विभाग के प्रोफेसर देवेंद्र कुमार गुप्ता ने कहा कि अमीर खुसरो हिंदी के ही नहीं भारतीय संस्कृति का दर्पण हैं। किंतु विशेष रूपसे हिंदी में उनकी जितनी चर्चा होनी चाहिए उतनी नहीं हुई। उन्होंने राजदरबार में रहकर भी मुक्त भाव से लोक काव्य लिखा है। उन्होंने भारतीय संस्कृति और मृदु लोक व्यवहार की जो चर्चा की है वह आज के दौर में बहुत प्रासंगिक है।
आयोजन सचिव डाॅ0 फैयाज़ अहमद ने धन्यवाद ज्ञापन करते हुए कहा कि अमीर खुसरो जितने बड़े साहित्यकार थे उतने ही बड़े संगीतज्ञ, आध्यात्मिक, दार्शनिक और दृष्टा थे। वे भारतीय संस्कृति के सच्चे प्रतिनिघि थे।
संगोष्ठी का संचालन डाॅ0 मोहम्मद साजिद ख़ान ने किया। कार्यक्रम का तकनीकी प्रबंधन डाॅ0 मोहम्मद अरशद ख़ान तथा डाॅ0 स्वप्निल यादव ने किया। संगोष्ठी के सफल आयोजन में डाॅ0 राकेश वाजपेयी, डाॅ0 दरख़्शां बी, डाॅ0 शमशाद अली, डाॅ0 काशिफ नईम, डाॅ0 परवेज़ मुहम्मद का विशेष योगदान रहा।
इस वेब-संगोष्ठी से प्रोफेसर शंभुनाथ तिवारी, डाॅ0 अनुराग अग्रवाल, डाॅ0 नसीमुस्शान खां, डाॅ0 नईमुदद्दीन सिद्दीक़ी, सैयद अनीस अहमद, ख़लील अहमद, डाॅ0 युक्ति माथुर, आयशा ज़ेबी, डाॅ0 मोहम्मद शोएब, डाॅ0 तनवीर हुसैन, दिव्यांश मिश्रा सहित देश-विदेश के विभिन्न हिस्सों से शिक्षक, शोधार्थी एवं छात्र-छात्राएं जुड़े रहे।


प्राचार्य
(प्रोफेसर जमील अहमद)
गांधी फ़ैज़-ए-आम काॅलेज, शाहजहाँपुर
ब्यूरो शाहजहां पुर 
तबस्सुम हुसैन की रिपोर्ट

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